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Re: Notices for revisions and refunds for enhanced EDC sent to colonizers

Postby BlessU » Sat Apr 28, 2012 1:29 pm


I would propose that a legal notice be sent through GFWA for refund of the roll back amount along with calculations for the same. Since everyone in the chain of events starting from HUDA, Builder charge interest on outstandings it may also be suggested to ask for interest @ 12% pa beyond 30 days from the date of notification.

Onus of providing the notification is not on the subscriber as the bipartite agreement of licensing is between the builder and DTCP.

Here a new EDC RELIEF policy has been announced by DTCP to give builders another reason to delay by 15 months. ... 10WUk/edit

This is given the fact that HUDA has not received 3500cr held as arrears by builders
http://articles.timesofindia.indiatimes ... aryana-edc
CHANDIGARH: Shocked over arrears of more than Rs 3,500 crore, Haryana government has finally woken up against colonizers who defaulted in payment of External Development Charges (EDC) and other levies to the town and country planning department (T&CP).

Courtesy an amendment made in the Haryana development and Regulation of Urban Areas Act 1975, the defaulting colonizers are now faced with civil imprisonment till the outstanding arrears are cleared. The amendment approved by Haryana governor on Monday is expected to be notified by Friday, officials in T&CP department said. Around 150 colonizers across the state are from the National Capital Region (NCR) of Gurgaon, Faridabad, Sonipat, Rohtak and Palwal, officials said.

Besides citing the huge amount being shown as outstanding arrears accumulated over the past two decades, officials reason the move, initiated after 35 years of enactment of the Act, as measure taken by Haryana government to keep a check on private colonizers who would generally escape the liability after paying a partial amount as EDC and other levies.

I wonder why this government doesnt take action instead of providing RELIEF!!!

Now the bank guarantee amounts, interest on delayed payment of EDC by builder to govt etc are going to be funded by none else but YOU and ME. Be ready for further unjustified claims and unethical charges to pay the same and yes do forget possession for another 15 months as without clearing EDC, builders cant get OC/Part-full completion certificates..THIS IS GUARANTEED.. only piecemeal possessions may be offered by a few but largely all builders are going to play as mentioned above.

This should give enough food for thought to seniors and experienced people in the forum about a proactive action plan..

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Joined: Wed Jun 22, 2011 11:51 pm

Re: Notices for revisions and refunds for enhanced EDC sent to colonizers

Postby ashoka2002inin » Sat Apr 28, 2012 4:35 pm

Dear Guys,
Please see the trailing news showing that how we are playing in the hands of Builders. They are making their 05 star offices, running in high values cars and enjoying abrods from our precieous money. Its means that they are taking money from us but not delivering.

अगर आपने नोएडा में पिछले तीन साल के दौरान कोई फ्लैट किसी बिल्डर के यहां बुक कराया है या अभी बुक कराने की सोच रहे हैं, तो सावधान रहें। हो सकता है कि बिल्डर आपसे तो नियमित रूप से किस्तें ले रहा हो, लेकिन अथॉरिटी के खाते में वह रकम जमा ही नहीं करा रहा हो। ऐसे में जरूरी है कि आप अथॉरिटी ऑफिस में जाकर ऐसे बिल्डर का रेकॉर्ड चेक करें। अथॉरिटी के रेकॉर्ड में लगभग 35 से ज्यादा ऐसे बिल्डर हैं जिन पर अथॉरिटी का 5 हजार करोड़ से ज्यादा बकाया है। इनमें कई नामी बिल्डर भी हैं।

फरवरी में अथॉरिटी ने कुल 117 बिल्डरों की सूची तैयार की थी। इस सूची में शामिल 3 दर्जन बिल्डरों की तो फाइलें ही नदारद थीं। लगभग 30 के करीब बिल्डर ही ऐसे निकले जिन्होंने अपनी पेमेंट अपडेट कर रखी है। बाकी पर डिफॉल्टर घोषित होने का खतरा मंडरा रहा है। चुनाव आचार संहिता के चक्कर में अथॉरिटी अफसरों ने बिल्डरों को कोई नोटिस जारी नहीं किया। अब जैसे ही नए सीईओ जॉइन करेंगे डिफॉल्टर की कैटिगरी में आने वाले बिल्डरों को नोटिस जारी कर उनकी लीज डीड तक कैंसल की जा सकती है। ऐसे में आपका पैसा भी फंस सकता है।

2008 में आई थी स्कीम, अथॉरिटी ने खोला था रियायतों का पिटारा

[ जारी है ]

2008 के बाद मंदी का हवाला देकर आई स्कीम में अथॉरिटी ने बिल्डरों के लिए राहतों का पिटारा खोल दिया था। न सिर्फ 10 पर्सेंट रकम लेकर प्लॉट की रजिस्ट्री कराई गई, बल्कि उन्हें 2 साल तक किस्त जमा न करने की छूट भी दी गई। इस दौरान बिल्डरों को सिर्फ ब्याज की रकम जमा कराने को कहा गया। बिल्डरों को प्लॉट में एफएआर और ग्राउंड कवरेज एरिया में भी छूट दी गई थी। यहीं नहीं अथॉरिटी ने बिल्डरों को 2005-06 के दौरान मुलायम राज में 28 हजार 800 रुपये प्रतिवर्ग मीटर की न्यूनतम बिड पर जमीन आवंटित की थी। तब एफएआर और ग्राउंड कवरेज भी कम था। 2009-10 में अथॉरिटी ने 20 हजार 800 रुपये प्रतिवर्ग मीटर की न्यूनतम रिजर्व प्राइस के आधार पर बिल्डरों को बड़े पैमाने पर जमीन आवंटित की। सेक्टर-75 में तो एक बिल्डर को 6 लाख वर्गमीटर जमीन 15 हजार 700 रुपये प्रतिवर्ग मीटर के आधार पर ही आवंटित कर दी गई। इस प्लॉट में 10 पर्सेंट कमर्शल था।

अब ज्यादातर हो रहे हैं डिफॉल्टर
अथॉरिटी के प्रशासनिक सूत्रों की मानें तो कई बिल्डर ऐसे हैं, जिन्होंने अथॉरिटी के अलॉटमेंट लेटर में दी गई शर्तों की जमकर धज्जियां उड़ाई। किसी ने ब्याज नहीं दिया तो किसी ने अपना नक्शा पास कराए बगैर ही फ्लैटों की बुकिंग शुरू कर दी। रजिस्ट्री कराने के बाद भी आवश्यक रकम जमा नहीं कराई। 2 साल का मॉरटोरियम पीरियड पूरा होने के बाद भी बैंकों ने किस्तें जमा नहीं कराई हैं। 5 हजार करोड़ बकाया होने की वजह से अथॉरिटी इन बिल्डरों का काम कभी भी रोक सकती है।

10 हजार फ्लैटों पर खतरा
5 हजार करोड़ बकाया होने की वजह से अथॉरिटी डिफॉल्टर बिल्डरों का काम कभी भी रोक सकती है। ऐसे बिल्डर जिन पर खतरा मंडरा रहा है, वे अपने प्रोजेक्ट सेक्टर-74, 75, 76, 77, 78, 92, 117, 118, 119, 121 और 137 में बना रहे हैं। इनमें करीब 10 हजार फ्लैट तो बनकर तैयार हो चुके हैं।

अफसरों से करा रहे हैं पेमेंट की री-शेड्यूल
2006 के दौरान नोएडा में जमीन खरीदने वाले 2 बिल्डरों ने अथॉरिटी को जमीन वापस कर दी थी। इसके बदले में नोएडा ने दोनों बिल्डरों को 3 सौ करोड़ रुपए वापस कर दिए थे। 2 बिल्डरों के अलावा जो बाकी बिल्डर बचे थे वे जमीन न मिलने के कारण अधर में अटक गए। उन बिल्डरों ने पब्लिक से फ्लैट की बुकिंग कर ली मगर अथॉरिटी ऐसे बिल्डरों को कब्जा भी नहीं दे सकी। ऐसे कई बिल्डर सेक्टर-112, 114,115, 116 में फंसे हैं। ऐसे बिल्डरों ने अपनी किस्तों को लेकर अथॉरिटी अफसरों से री-शेड्यूल करवा रहे हैं।

पब्लिक से पैसा लेकर खरीद रहे हैं नए प्लॉट
पब्लिक से फ्लैट की बुकिंग का पैसा लेकर बिल्डर उस पैसे को किसी दूसरे प्रोजेक्ट में लगा रहे हैं। बिल्डर दूसरे एरिया में जमीन खरीदकर अपना लैंड बैंक बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा वे जब तक अथॉरिटी की पहली किस्त देंगे, तब तक पब्लिक से शत प्रतिशत रकम ले चुके होंगे।

क्या है मॉरटोरियम
अमूमन यह सुविधा ऐसे आर्थिक संकट के दौर में दी जाती है, जब भूकंप या बाढ़ से बिजनेस प्रभावित होता है। ऐसी स्थिति में पेमेंट की शेड्यूलिंग में छूट देने का प्रावधान होता है।

क्या कहते हैं अधिकारी
नोएडा अथॉरिटी के वित्त नियंत्रक, ए. सी. सिंह कहते हैं, अथॉरिटी ने शासन से मिली मॉरटोरियम की सुविधा के आधार पर 2 साल का ग्रेस पीरियड बिल्डरों को दिया था। इनमें से कुछेक बिल्डरों ने अपने पेमेंट प्लान को री-शेड्यूल करा लिया था। जिन बिल्डरों ने अपनी किस्तों को री-शेड्यूल करा लिया था, उन्हें डिफॉल्टर की सूची में नहीं डाला जा सकता। वहीं ऐसे बिल्डर, जिन्होंने समय पर पेमेंट नहीं किया है, उन्हें निश्चित रूप से डिफॉल्टर कहा जा सकता है। इस तरह के बिल्डरों को फाइनैंस डिपार्टमेंट ने डिमांड लेटर जारी किए हैं। बाकी का काम संबंधित विभाग का है।

नोएडा अथॉरिटी के डिप्टी सीईओ डी. के. सिंह का कहना है, 'मैं इस बारे में पूरा ब्यौरा नहीं दे सकता। शैलेंद्र कैरे ही बिल्डरों को नोटिस देने का काम देखते हैं। वे ही इस बारे में कुछ जानकारी दे पाएंगे।'
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